Saturday, March 2, 2019

कभी बुखार तो कभी तूफान हूँ ..


कभी बुखार तो कभी तूफान हूँ 
कभी झील तो कभी आसमान 
कभी तकलीफ हूँ 
जैसे सुई अटकी हुई गले में 
कभी मरहम हूँ 
खुद को ठीक करता हुआ 

कभी कहर हूँ जैसे कोई 
कभी चिंघाड़ हूँ 
मैं धरती हूँ कभी 
और कभी आग हूँ 



Saturday, February 16, 2019

लिखकर

ज़ख्म जिनकी मरम्मत करने में मैं लगी थी
नाज़ुक थे इतने
कि उन्हें बस सहलाया जाना चाहिए था



कैसे

बक्श दो माफ् कर दो मुझे
मैंने पाप किएँ हों जो भी
मैं मान लेती हूँ और भाग जाती हूँ



Tuesday, December 18, 2018

अपनी माँ की नींद के बदले

मैं फ़ोन लगाती हूँ माँ को 
वो सोने जा रही हैं शायद,
रोज़ की ही तरह थकावट है आवाज़ में 
मगर मैं 
पूछने लगती हूँ उनसे सवाल 
कि मेरे नाम क्या क्या थे बचपन में? 
मैंने किस किस को किया था कितना परेशान,
कि कब लगी थी सर पर चोट,
और कितने दिन नहीं गयी थी तब स्कूल..



Wednesday, December 12, 2018

घर

जब हार गयी मैं डरते डरते , लड़ते लड़ते और रोकर 
मेंने हंसना शुरू किया अपने हाल पर 
और पाया खुद को एक जंगल के बीच में 
जिसमे लोग बस चले जा रहे थे 
रुकने जैसी कोई चीज़ जैसे बनी ही न हो कभी 
जैसे कदम रखते जाना श्राप हो कोई 
या बस आदत 



Wednesday, November 21, 2018

कितनी कहानी मेरी, कितनी मोहब्बत

प्यार में कुआँ होना बर्दाश्त नहीं होता जब 
लोग मिटटी हो जाया करते हैं 
कुरेदते हैं खुद ही 
खा लेते हैं कभी थोड़ा.. 
और कभी खुद ही करते हैं दफन खुद को...



..मगर किया

एक  दिन आएगा 
जब मुझे फर्क नहीं पड़ेगा 
और तब, कर लेना कुछ भी तुम.. 
मैं नहीं लौटूंगी..