Tuesday, December 18, 2018

अपनी माँ की नींद के बदले

मैं फ़ोन लगाती हूँ माँ को 
वो सोने जा रही हैं शायद,
रोज़ की ही तरह थकावट है आवाज़ में 
मगर मैं 
पूछने लगती हूँ उनसे सवाल 
कि मेरे नाम क्या क्या थे बचपन में? 
मैंने किस किस को किया था कितना परेशान,
कि कब लगी थी सर पर चोट,
और कितने दिन नहीं गयी थी तब स्कूल..



Wednesday, December 12, 2018

घर

जब हार गयी मैं डरते डरते , लड़ते लड़ते और रोकर 
मेंने हंसना शुरू किया अपने हाल पर 
और पाया खुद को एक जंगल के बीच में 
जिसमे लोग बस चले जा रहे थे 
रुकने जैसी कोई चीज़ जैसे बनी ही न हो कभी 
जैसे कदम रखते जाना श्राप हो कोई 
या बस आदत