Wednesday, August 10, 2016

पहुँचना

बचपन और बड़े होने के बीच
एक लट में उलझी पड़ी हूँ मैं

कभी इधर कभी उधर
खींचती, टूटती हूँ
तो कभी बस खूबसूरती बढ़ाती हूँ
बस तय कर पाना मुश्किल है थोड़ा

शहर, गांव, कस्बे, आसमान और समंदर
सब लांघ जाऊँ मगर
पहुँचूँ कहाँ, गर मालूम हो बस| 



आधी रात

रास्ते पर निकलती है तो
निकलती ही जाती है
सुबह से शाम
शाम से रात
और यूँ आधी रात के अंधेरे में
वो है बीच इस जंगल के

इससे पहले ढूँढती रही घंटों
टटोल रही थी अलमारी
और फिर छत पर गयी
कुछ ढूँढने से जब मिला नहीं
तो पत्तों को हटाया झाड़ू से
सूखे पत्ते पीपल के
दिए जलाए कुछ और लौट आयी

फिर खोजा कुछ और जगहों पर



बंद होंठ

सारे डर इस लम्हे में आने थे
सबसे मिलना था ऐसे ही
जी हज़ूरी सालों की
एक क़िस्सा ख़त्म

रास्ता अचानक कट गया
बाड़ थी या आवेग
दर्द पीकर ख़त्म किया
और बढ़े आगे
आसमान से चिल्लाया कोई
कूदा और नोंचा गला मेरा
पकड़कर गला एक हाथ से
मैं ताकती रही उस बूँद को बादल में
टपक ही नहीं रही थी
लाल ख़ून, गाढ़ा जैसे कीचड़



Thursday, August 4, 2016

लहर लहर

मैंने लहर को देखा है उठते हुए
लाँघते हुए पहाड़
तो कभी सिमटते हुए ख़ुद ही में
खोते हुए अस्तित्व कभी
तो रचते हुए भी