Saturday, February 16, 2019

लिखकर

ज़ख्म जिनकी मरम्मत करने में मैं लगी थी
नाज़ुक थे इतने
कि उन्हें बस सहलाया जाना चाहिए था


मैने रखी कुल्हाड़ी एक पेड़ की जड़ में छुपाकर
कि पेड़ के पास हो कोई हथियार अपनी रक्षा के लिए
मैं बेवकूफ ही नहीं
मासूम भी थी
और इसीलिए मुझे माफ़ करते गए थे सब


कोई दवा अब ऐसी नही बची थी
जिससे भर सकता था कोई ज़ख्म पूरा
कोई शब्द ऐसा नहीं जिससे लिखी जा सकती थी कोई कविता पूरी
कोई इंसान ऐसा नहीं
जिसके सामने मैं जाती
और बस रो पाती
मैंने एक एक करके
सबको रख दिया था एक दूरी पे

रफू कर करके हम पहन रहे थे रिश्तों को
और नही मालूम हम में से किसी को भी
की जीवन बढ़ रहा था या घट रहा था
इस बात की किसी को पड़ी भी नही थी हालांकि
वक़्त बीत रहा था,
और इतना काफी था फिलहाल

हमारे आने वाले कल में कोई उम्मीद नही थी
और हम आज के हवाले जिये जा रहे थे
और यकीन मानिए ये इतना दुखदायी नही था
जितना यहां लिखकर मैने बना दिया है इसे।





3 comments:

  1. उफ़ कितने करीने से भावों की नदिया को जैसे छितरा कर गुनगुनी धूप मे खिले फूलों पर सजा दिया है आपने!

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