नमक के इस्तेमाल अभी और समझ आने थे
जीने के बीच साँसों में उधारी आनी थी
एक बच्चा, जो सींचता था क्यारियां दिन-रात
उसे खुद को बड़ा करना था
और होना था बेचैन
फिर आना था वो लम्हा
पहली बार गाली देना मुंह से
आप खुद को देते हो..
बड़ा होना जैसे होना शहर
रास्ते पर निकलती है तो
निकलती ही जाती है
सुबह से शाम
शाम से रात
और यूँ आधी रात के अंधेरे में
वो है बीच इस जंगल के
इससे पहले ढूँढती रही घंटों
टटोल रही थी अलमारी
और फिर छत पर गयी
कुछ ढूँढने से जब मिला नहीं
तो पत्तों को हटाया झाड़ू से
सूखे पत्ते पीपल के
दिए जलाए कुछ और लौट आयी
सारे डर इस लम्हे में आने थे
सबसे मिलना था ऐसे ही
जी हज़ूरी सालों की
एक क़िस्सा ख़त्म
रास्ता अचानक कट गया
बाड़ थी या आवेग
दर्द पीकर ख़त्म किया
और बढ़े आगे
आसमान से चिल्लाया कोई
कूदा और नोंचा गला मेरा
पकड़कर गला एक हाथ से
मैं ताकती रही उस बूँद को बादल में
टपक ही नहीं रही थी
लाल ख़ून, गाढ़ा जैसे कीचड़