Saturday, February 4, 2017

दिसम्बर

जीभ पर खून का स्वाद
आत्मा पर तुम्हारा
दिल डूबता है
छिपता है बर्फ में कहीं
चल चलकर थकती नहीं मैं
ख़त्म नहीं होता दिसम्बर, महीनो



Thursday, September 29, 2016

चक्कर गोल

ऐसा तो नहीं है
की तुम्हारे नहीं होने से
सुबह नहीं होती
दिन शाम में मिलने से मना करता
या धड़कन धीमी पड़ जाती मेरी
झील की ठंडक कम होती
या समंदर नदी को चाहना छोड़ देता

ऐसा कुछ भी नहीं होता
जो बदल सकता मायने जीने के
लेकिन फिर भी
चाहती तो थी मैं, कि तुम रहो



Wednesday, September 7, 2016

नमक क्यारियां

नमक के इस्तेमाल अभी और समझ आने थे
जीने के बीच साँसों में उधारी आनी थी
एक बच्चा, जो सींचता था क्यारियां दिन-रात
उसे खुद को बड़ा करना था
और होना था बेचैन
फिर आना था वो लम्हा
पहली बार गाली देना मुंह से
आप खुद को देते हो..
बड़ा होना जैसे होना शहर



Monday, September 5, 2016

काला

हमें चुनने थे एक दूसरे के लिए ज़ख्म
और उनमे पिरोना था नमक
फिर हमें होना था अमर
और जाना जाना था अपने शक्तिशाली होने के लिए



Wednesday, August 10, 2016

पहुँचना

बचपन और बड़े होने के बीच
एक लट में उलझी पड़ी हूँ मैं

कभी इधर कभी उधर
खींचती, टूटती हूँ
तो कभी बस खूबसूरती बढ़ाती हूँ
बस तय कर पाना मुश्किल है थोड़ा

शहर, गांव, कस्बे, आसमान और समंदर
सब लांघ जाऊँ मगर
पहुँचूँ कहाँ, गर मालूम हो बस| 



आधी रात

रास्ते पर निकलती है तो
निकलती ही जाती है
सुबह से शाम
शाम से रात
और यूँ आधी रात के अंधेरे में
वो है बीच इस जंगल के

इससे पहले ढूँढती रही घंटों
टटोल रही थी अलमारी
और फिर छत पर गयी
कुछ ढूँढने से जब मिला नहीं
तो पत्तों को हटाया झाड़ू से
सूखे पत्ते पीपल के
दिए जलाए कुछ और लौट आयी

फिर खोजा कुछ और जगहों पर



बंद होंठ

सारे डर इस लम्हे में आने थे
सबसे मिलना था ऐसे ही
जी हज़ूरी सालों की
एक क़िस्सा ख़त्म

रास्ता अचानक कट गया
बाड़ थी या आवेग
दर्द पीकर ख़त्म किया
और बढ़े आगे
आसमान से चिल्लाया कोई
कूदा और नोंचा गला मेरा
पकड़कर गला एक हाथ से
मैं ताकती रही उस बूँद को बादल में
टपक ही नहीं रही थी
लाल ख़ून, गाढ़ा जैसे कीचड़