Tuesday, January 28, 2020

चोट

उसे चोट लगी थी 
और वो ये बात मानने को तैयार नही था 

इस ना मानने के चक्कर में 
उसने कितने लोगों को चोट दी 
इसकी गिनती करना लगभग असंभव है

रिसता था ज़ख्म और फैलता था 
मगर ज़िद, 
ये प्यारी ज़िद 
गुरुर, ये कमबख्त गुरुर 

दुनिया सफेद और काले में नहीं गढ़ी गयी थी 
जितने रंग थे 
उतने दर्द भी ज़रूर 

किस दर्द का क्या इलाज है 
हम अक्सर नहीं समझ पाते थे 
और ग़लत दवाई लेते लेते ओर ओर बीमार होते जाते थे 

तुमने सुना नहीं
मैंने कहा नहीं
लेकिन वो चोट 
उसे छुपाओ मत, न ढको उसे 
आने दोगे करीब थोड़ा तो मरहम भी लगा दूँ मैं
गले भी लगा लूँ मैं
मगर ये पागलपन
ऐसे नहीं जिया जाएगा ज़्यादा दोस्त 

प्यार से कोई बात कही जाए तो समझ जाते हैं लोग 
ऐसा कहा जाता है 

मेरी आखिरी  कोशिश उस राह में ये कविता है।



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