Thursday, August 6, 2015

लौटना

घाव में नमक डालते हुए
हम आज़ाद होने की उम्मीद में
अपने बच्चों को दे रहे थे कुछ सुख
चुन रहे थे एक वक़्त उनके लिए
जिसकी डालियों पर कांटें थे मगर
खूशबू आती थी जड़ों से

हम खो चुके थे
अँधेरा था ना गरीबी
ना कोई कमी ही दुनिया में
बस एक कोहरा था दिमाग में
और ढकते ही गए थे फिर
दबते गए थे शायद
होते गए छोटे
और यूँ हुए गायब
मगर वो बेहतर था

सफ़ेद रंग का एक पुल
हर तरफ से खूबसूरत
उम्मीद जगाता नहीं मगर, क्यूँ?
खुली बड़ी खुबसूरत चमकदार आँखों से
देखने पर भी दुनिया रंगहीन ही लगी, क्यूँ ?

सूजी के दानो सा बारीक और खुबसूरत
कुछ अटक गया है नसों में
खून में मिल गया है
चोरी किया हुआ बर्फ का पानी

पहाड़ बदला नहीं लेंगे हमसे
मगर हम खुद को माफ़ भी करेंगे तो कैसे?

आँख लगती है ज़रा भी
तो सपना नहीं आता कोई
नज़र आती है एक हक़ीक़त
हक़ीक़त जिससे भागकर सोना चाहा था आपने

भागो या ठहरो
सांस लो रूककर थोड़ा
सुनो एक लम्हें को
और मानो किसी भी खुदा को आप
लेकिन मान लो थोड़ा खुद को भी
भरोसा ज़रा सा उधार लेकर
खोलते हैं एक museum  
रखते हैं पुराने सारे विश्वास उसमें
और एक आखिरी कोशिश करते हैं
जीने की किसी पहले लम्हें में
और जानने की पहाड़ को उसकी ऊंचाई के लिए
नदी को बहने के लिए
और खुद को उस बचपन के लिए
जिसमे 'चोरी करना और झूठ बोलना ग़लत बात है'
सीखा था हमने।



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